ज़िदगी की डगर में तमाम अफ़साने बने
कुछ रिश्ते अपने रहे कुछ बेगाने बने
अपनों के अपनेपन से बहुत तराने बने
चौबीस तक आते-आते देखे बहुत जमाने
इन बनते-बिगड़ते अफ़सानों के बीच न जाने कितने जमाने बने।
- Vivek Tripathi
कुछ रिश्ते अपने रहे कुछ बेगाने बने
अपनों के अपनेपन से बहुत तराने बने
चौबीस तक आते-आते देखे बहुत जमाने
इन बनते-बिगड़ते अफ़सानों के बीच न जाने कितने जमाने बने।
- Vivek Tripathi
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