क्या
विडम्बना है! यह बहुत ही दुर्भाग्य की बात है कि किसी देश के युवाओं को
अपनी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा को देश की सबसे बड़ी प्रतियोगी परीक्षा में
प्राथमिकता दिलाने के लिए आन्दोलन करना पड़ रहा है। इससे पता चलता है कि उस
देश के नीति निर्धारकों के बारे में कि वे किस स्तर की सोच के हैं और उनकी
दूरदर्शिता कितनी है। यह हम भारतीयों का दुर्भाग्य है, और यह हमारे साथ अन्याय
है कि हमें अपनी राष्ट्रभाषा हिन्दी तथा अन्य
भारतीय भाषाओँ के सिविल सर्विस की परीक्षा में उपेक्षित होने पर आन्दोलनरत
होना पड़ा है, और इस उपेक्षा का कारण बनी वह अंग्रेजी भाषा जिसके असल
भाषियों ने हमारे भारत को शादियों तक गुलाम बनाये रखा।
क्या हम वास्तविक एवं पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो पाये हैं जबकि अंग्रेजियत हम पर इतनी हावी है -- नहीं। क्या किसी देश में विदेशी भाषा को इस हद तक प्राथमिकता देना कि उसके असल राष्ट्रभाषी एवं मातृभाषी लोग हाशिये पर चले जाएँ या लगभग पूर्ण रूप से उपेक्षित हो जाएं, राष्ट्रविरोधी कार्य नही है? अंग्रेजी ज्ञान हो जाने मात्र को ज्ञानी होने का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। विदेशी भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा की उपेक्षा कर विदेशी भाषा को अपने कार्यरूप में शामिल करना पूर्णतः प्रगतिविरोधी और राष्ट्रविरोधी नीति है। किसी देश की संस्कृति एवं सभ्यता की उन्नति का आधार उस देश की राष्ट्रभाषा और मातृभाषा की उन्नति में निहित होता है।
हम स्वतन्त्र होकर अभी भी परतंत्र हैं और यह परतंत्रता समय के साथ बढ़ी ही है। इसका सबसे बड़ा उदहारण है- हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति का विकास जोकि बहुत तेजी से हुआ है, चाहे वह वैचारिक स्तर पर हो या सांस्कृतिक स्तर पर। और इसी का दुष्परिणाम है समाज में फैलती अनैतिकता और बढ़ते अपराध। लेकिन, फिर भी ये परतंत्रता हमें भाती है क्योंकि इससे दूसरे देशों की नजर में हम प्रगतिशील हैं।
मातृभाषा की उपेक्षा कर विदेशी भाषा को अपनी शासन प्रणाली में प्राथमिकता देना प्रशासन और जनता के बीच संवादहीनता को जन्म देना है जिससे शासन व्यवस्था कभी सुचारू ढंग से चल ही नहीं सकती। मातृभाषा और राष्ट्रभाषा की उन्नति के बिना कभी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकरूपता आ ही नहीं सकती।
समय आ गया है की हमारे सत्तासीन रहनुमा इस पर गहन चिंतन एवं मनन करें तथा राष्ट्रभाषा एवं मातृभाषा की सतत उन्नति सुनिश्चित करें जिससे राष्ट्र एवं समाज की उन्नति सुनिश्चित हो सके। वैसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने बिल्कुल सही लिखा है कि -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटय न हिय के शूल
क्या हम वास्तविक एवं पूर्ण रूप से स्वतन्त्र हो पाये हैं जबकि अंग्रेजियत हम पर इतनी हावी है -- नहीं। क्या किसी देश में विदेशी भाषा को इस हद तक प्राथमिकता देना कि उसके असल राष्ट्रभाषी एवं मातृभाषी लोग हाशिये पर चले जाएँ या लगभग पूर्ण रूप से उपेक्षित हो जाएं, राष्ट्रविरोधी कार्य नही है? अंग्रेजी ज्ञान हो जाने मात्र को ज्ञानी होने का पर्याय नहीं माना जाना चाहिए। विदेशी भाषा का ज्ञान होना अच्छी बात है लेकिन अपनी राष्ट्रभाषा और मातृभाषा की उपेक्षा कर विदेशी भाषा को अपने कार्यरूप में शामिल करना पूर्णतः प्रगतिविरोधी और राष्ट्रविरोधी नीति है। किसी देश की संस्कृति एवं सभ्यता की उन्नति का आधार उस देश की राष्ट्रभाषा और मातृभाषा की उन्नति में निहित होता है।
हम स्वतन्त्र होकर अभी भी परतंत्र हैं और यह परतंत्रता समय के साथ बढ़ी ही है। इसका सबसे बड़ा उदहारण है- हमारे देश में पाश्चात्य संस्कृति का विकास जोकि बहुत तेजी से हुआ है, चाहे वह वैचारिक स्तर पर हो या सांस्कृतिक स्तर पर। और इसी का दुष्परिणाम है समाज में फैलती अनैतिकता और बढ़ते अपराध। लेकिन, फिर भी ये परतंत्रता हमें भाती है क्योंकि इससे दूसरे देशों की नजर में हम प्रगतिशील हैं।
मातृभाषा की उपेक्षा कर विदेशी भाषा को अपनी शासन प्रणाली में प्राथमिकता देना प्रशासन और जनता के बीच संवादहीनता को जन्म देना है जिससे शासन व्यवस्था कभी सुचारू ढंग से चल ही नहीं सकती। मातृभाषा और राष्ट्रभाषा की उन्नति के बिना कभी सामाजिक एवं सांस्कृतिक एकरूपता आ ही नहीं सकती।
समय आ गया है की हमारे सत्तासीन रहनुमा इस पर गहन चिंतन एवं मनन करें तथा राष्ट्रभाषा एवं मातृभाषा की सतत उन्नति सुनिश्चित करें जिससे राष्ट्र एवं समाज की उन्नति सुनिश्चित हो सके। वैसे भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने बिल्कुल सही लिखा है कि -
निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटय न हिय के शूल
No comments:
Post a Comment